उपन्यास : जीवन एक संघर्ष
उपन्यासकार : किशोर शर्मा 'सारस्वत'
कुल भाग : 42, कुल पृष्ठ : 940
आज समीक्षा : भाग 15 की
कथानक : रमन द्वारा स्थापित राधोपुर विद्या मंदिर पाठशाला सभी आयु वर्ग वालों के लोगों को आकर्षित करने लगा। इससे उसकी व्यस्तता बढ़ गई।
लेकिन उपन्यास के 25 पृष्ठीय अंक के केन्द्र में रमन की बहन जयवंती का विवाह है। इसमें रमन के पिता के दोस्त माधो तथा माधो की गुंजनपुर गाँव में ब्याही बहन नसीबो के प्रयासों से विवाह तय होना, विवाह के ऐन मौके पर मानवता के दुश्मन सरपंच केहर सिंह और उसके साथी का माधो की कुलटा पत्नी ननकी के साथ मिलकर जयवंती के ससुराल वालों को जयवंती के सम्बन्ध में दुष्चरित्र होने की झूठी खबर परोसना तथा विवाह से मनाही पर जगपाल का मूर्च्छित हो जाना, इन विषम परिस्थितियों में रमन के प्रिय मित्र राजू द्वारा विवाह में उपस्थित अपनी माँ से जयवंती के साथ विवाह की अभिलाषा व्यक्त करके सहमति बनना जैसी घटनाएँ सम्मिलित हैं।
उपन्यासकार ने इन सब घटनाओं को इतना कुशलतापूर्वक गूँथा है कि पाठक एक साँस में इन 25 पृष्ठों को पढ़ने को विवश हो जाता है।
आइए, लेखक के इस हुनर का आनंद कुछ संवादों के अंशों के माध्यम से उठाते हैं:
- 'आजकल जमाना बहुत बदल चुका है, आदमी के चार आँखें, चार कान होने चाहिए तभी वह इस दुनिया में जी सकता है वरना धक्के ही मिलते हैं।' (पृष्ठ 238)
- किसी अच्छे काम के लिए बुरे आदमी से बोला गया झूठ, झूठ नहीं है। ऐसे झूठ को तो भगवान भी माफ कर देता है। (पृष्ठ 240)
- 'प्रधान, मेरा नाम भी ननकी है। मेरा काटा हुआ तो पानी भी नहीं माँगता, ये तो है किस खेत की मूली?भाई-बहन, दोनों को मदारी के बंदरों की तरह न नचाया तो मेरा नाम बदल देना। बस, मुझे थोड़ी सी तेरी मदद की जरूरत है।' (पृष्ठ 248)
- 'भाभी, तू हुक्म कर, केहर सिंह ने भलाई के काम में कभी पीठ नहीं दिखाई। बोल, क्या पैसों की जरूरत है? ये पकड़ दो सौ रुपये खर्चे के लिए। और चाहिए होंगे तो वो भी मिल जाएँगे।' (पृष्ठ 248)
- 'बहन, तुम समझोगी भी कैसे? तुम सब को अँधेरे में जो रखा गया है। अब जब बात खुल गई तो मैं बताती हूँ। तुम्हारी होने वाली बहू का चाल-चलन ठीक नहीं है। असलियत पूछो तो पूरी कुलटा है।' (पृष्ठ 252)
- 'रमन माई फ्रेंड, बी स्ट्रांग। क्या तुम दुश्मनों के मंसूबे पूरे होते देखना चाहते हो? चलो, गाँव वापस चलते हैं। जिस परमात्मा ने पैदा किया है, इंसान का भाग्य भी उसी ने बनाया है। इसलिए जो किस्मत में लिखा है उसे कोई नहीं बदल सकता। हम सच्चे हैं और भगवान भी सच्चाई का ही साथ देता है। (पृष्ठ 258)
जैसा कि उपन्यास का नाम है, इस भाग का कथानक भी संघर्षों के साथ हिचकोले लेता हुआ अंतत: वहाँ ठहर जाता है जहाँ घुप्प अँधेरे के आगे रोशनी प्रकट हो जाती है।
भाषा सरल व प्रभावी है जो नदिया की धारा सी प्रवाहमान है। संवाद छाप छोड़ने वाले हैं। कथासूत्र परस्पर गुंथे हुए हैं जिन्हें छिन्न-भिन्न नहीं किया जा सकता। रोचकता का कथानक के साथ गहरा जुड़ाव है जो पाठकों को बाँधे रखने में सक्षम है।
अगले भाग की समीक्षा हेतु आपको कल तक के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
समीक्षक : डाॅ.अखिलेश पालरिया, अजमे