दिनांक -२९/०९/२४
विषय -बेटियाॅं
विधा -कविता
बेटियाॅं पावन दुवाऍं हैं।
बेटियाॅं वेदों की ऋचाऍं हैं।।
वो ख़ुशनसीब है माता-पिता।
जिनके आंगन बेटियाॅं खेलती हैं ।
बेटियाॅं माता-पिता की प्यारी है।
वह आंगन की तुलसी क्यारी है।।
बेटियाॅं हैं चहकती चिड़ियाॅं ।
बेटियाॅं है महकती बगियाॅं ।।
हमारी संस्कृति में बेटियाॅं पराया धन है फिर भी।
मायके में राज दुलारी और साम्राज्ञी ससुराल में है।।
स्वरचित एवं मौलिक, डॉ दमयंती भट्ट