गले में हार होना था मगर नफ़रत की माला है
समाजों ने रिवाजों ने सब कुछ नोच डाला है
कहाँ से उग्रता आई, कहाँ से रोश आया है
जीवित मार देने का कहाँ से दोष आया है?
जो इसको बाँधने वाले हैं, ठेकेदार लगते हैं
मगर दुःख है कि रिश्ते में ये रिश्तेदार लगते हैं
इन्हीं में दोस्त भी होंगे इन्हीं में यार भी होंगे
इन्हीं में घर के और बाहर के पहरेदार भी होंगे
तो जैसे जिस्म बाँधा है क्या रूह को बाँध पाओगे?
जो कालिख तन पे मल डाली है मन पे डाल पाओगे ?
अरे ओह धूर्त ! सबके पाप जो धोती है गंगा है
करो मैला उसे ये रूप उसका फिर भी चंगा है
किसी से नेह रखना पाप का पर्याय होता है ?
किसी को मान लेना क्या नया अध्याय होता है ?
कभी मन जान पाते तो समझते प्रेम की मंशा न
होता पाप धरती पे, न फिर होती कोई हिंसा
अगर तुम प्रेम ही करते तो ये कालिख नहीं होती
तुम्हारे प्रेम के दम से, ये औरत हँस रही होती
मगर तुमने बदला चाहा है हरदम हर दफ़ा आदम
तुम्हें सब चाहिए, सब चाहिए कुछ भी मिले लेकिन सब कम
मिलेगी वाहवाही तुमको भी उन धूर्त लोगों से
घिरे षड्यंत्र, नफ़रत से भरे उन मूर्ख लोगों से
जिन्हें औरत की इज़्जत का नहीं है मान रत्ती भर
जिन्हें भाती हैं महिलायें जो अक्सर ओढ़ती हैं डर की चादर
ये मर्यादा की कैसे लाँघ सकती है कोई देहरी?
चलो साबित किया तुमने कि ये महिला ग़लत ठहरी
मगर तुम भी कहाँ अच्छे हो देखो आईना जा कर
तुम्हें क्या मिल गया बाज़ार में अस्मत को लुटवा कर ?
ये नैतिकता, समाजिकता ये शिष्टाचार अच्छा है
ये सब सर चढ़ के कहता है कि अत्याचार अच्छा है
सही का और ग़लत का फेर भी एक आम क़िस्सा है
मगर ये बदसलूकी, बेहयाई किसका हिस्सा है ?
कहाँ होना था हमको और कहाँ हम हैं खड़े आकर
बहुत खुश हैं किसी को नीच से भी नीच दिखलाकर
अगर ऐसी ही दुनिया है तो इस दुनिया में मत लाना
मुझे चिड़िया बना देना यहाँ मुझको नहीं आना