व़क्त की बेड़ियॉं.... (ग़ज़ल)
व़क्त की बेड़ियाँ हैं, अभि चलने नहीं देतीं,
हर ख़्वाब को क़समक़श में पलने नहीं देतीं।
चाहत की राहों में, कांटे बिछा देतीं है
हसरतों के फूलों को खिलने नहीं देतीं।
दिल में अरमानों की तस्वीरें सजाते हैं हम,
पर व़क्त की लहरें उन्हें ठहरने नहीं देतीं।
इक उम्र गुज़री है इन्तज़ार की आहों में,
पर ये बेड़ियाँ हमें अभि सँवरने नहीं देतीं।
आसमान में उड़ने की ख़्वाहिशें हैं मगर,
व़क्त की बंदिशें हमें उड़ने नहीं देतीं।
©- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'