नज़र जो है निगाहबां मेरे इश्क-ए-असरार मेरी,
हर लम्हा नज़र आता है, महफिल-ए-यारान मेरी।
हरदम का है कफ़स और रक़ीब-ए-ज़िंदगी है,
जहाँ-ए-मौजूद में खिलती नहीं आज़ादी मेरी।
चमन-ए-गुलशन में बिखरी है, है जो खुशबू तेरी,
वही तो है हयात मेरी, वही तो है कहानी मेरी।
हर सुबह-ए-बहार जांना में, तेरी याद जो जगी है,
वही तो है उजाला, और वही शब-ए-फ़साने मेरी।
लफ़्ज़ों की अदा से जो ज़ुबान मेरी सजती है,
वही असर-ए-इश्क, वही ग़ज़ल-ए-दिल मेरी।
जहाँ जहाँ मैं गुज़रा, तेरा ही अक्स था साथ मेरे,
कहीं भी हूँ, बस तू ही है जो मंज़र-ए-हस्ती है मेरी।
दर्द-ओ-गम का सिलसिला, वही तो है रंग-ए-जिंदगी,
हर एक क़तरा आंसुओं का है, वही तो है फ़रियाद मेरी।
महफिल-ए-मौसकी के कलम से जो निकलती है सदा,
ईश्क-ए-मिजाज मिसरा में जो है, वही तो है गुफ़्तगू मेरी।
कफ़स-ए-शहर में जो हैं परिंदे, वो भी मेरी जुबान हैं,
हर एक शिकस्तन दिल में, बसती है जो दास्तान मेरी।
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सप्रेम-स्वरचित मनोरजंन मनोरथपूर्ण भाव सहित
अकथ बस, नेपथ्य में बहुत कुछ सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक परिदृश्य के मांनिद अपने आप मन के भाव को जोडे-समस्या को कसौटी पर परखे, केवल चितंन योग्य, मय आंनन्द
जुगल किशोर शर्मा-बीकानेर-9414416705