बाज ए सिकंदर भीर थी, बस पोरूष मैं न था,
बरवक्त था, ग़म था, बस बदले का मन न था।
सदा इश्क के जंगल में रहम भी कफ़स था,
दिल था, कैद था, पर उड़ान ए क़स्र न था।
मैने दास्तान-ए-हयात का हर नक्श मिटाया,
आरज़ू थी, तलब थी, मगर हासिल-ए-मन न था।
क्या कहूं कैसा था रंग-ए-शब-ए-फ़िराक़,
रात थी, तन्हाई थी, पर चाँद यु समा न था।
हमने शब-ए-हिज्र की तमन्ना ने जज़्बात जलाए,
शाम थी, सूरज था, पर रोशनी का जता न था।
हरदिन मौत के साये में जिंदगी ने रक़्स किया,
जिस्म था, जान थी, पर रूह का मंज़र न था।
बरहाल हर ज़ख्म-ए-दिल दर्द की तहकीकात थी,
नश्तर था, नशा था, पर मरहम का फरमान न था।
सोज़-ए-मोहब्बत से दिल को जलाया हमने,
आतिश थी, घोष थी, पर आब-ए-शाम न था।
जब अक़ल ने जुनून को भटका दिया राहों में,
राह थी, ख़ौफ़ था, पर मंज़िल-ए-अमन न था।
वो हर नगमा-ए-गम में साज का शोर था,
रूकन था, शेर था, पर सुर ए सजान न था।
बस जज़्बा-ए-दिल की हदों को आज़माया हमने,
हुदूद थी, हदास था, पर अंदाज़-ए-ज़ुबान न था।
मैने हर सांस-ए-तनहाई में आह भी थी कहीं,
बची सांसथी, आहथी, पररूह ए गुमान न था।
सप्रेम-स्वरचित मनोरजंन मनोरथपूर्ण भाव सहित
अकथ बस, नेपथ्य में बहुत कुछ सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक परिदृश्य के मांनिद अपने आप मन के भाव को जोडे-समस्या को कसौटी पर परखे, केवल चितंन योग्य, मय आंनन्द
जुगल किशोर शर्मा-बीकानेर-9414416705