नजर ताउमर सदाए बस उधार से,
खुद के उस पार है सब्र उधार से
साकिह किसी और की खिदमत में,
बेखुद राहे खोना रहा, सब उधार में
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पहले नज़र अंदाज़, फिर हँसेंगे सब लोग,
जंग-ए-हक़ रहगुज़र, जीता सब उधार में ।
कल ही रंवादंवा कर, आज जीने का चैन,
सीखना है हमेशा, बस ये इल्म सब उधार में ।
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जयिफ यु माफ़ नहीं करते, ये बाशुजात,
क़ुव्वत का पैगाम, ये इबादत सब उधार में ।
दुनियाह बदली बदली, सबऔर यु आती है,
ख़्वाब देखो, यामानूह हकीकत सब उधार में ।
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गुस्सा या नफ़रत, समझाह ये दुश्मन हैं,
सोच की राह में, रोके टोके सब उधार में ।
इंसान ए गहदाब, रात से पहले भूल जाए
वाह नींद में सुखूं, ख्वाब रंगे सब उधार में
इंसान है अपने ख्यालात का आइना हरदफा,
मुकम्मत ए जहॉं बन जाता है सब उधार में ।
दुआ मांगना नहीं, रूह तलाश भी नहीं है,
अल्फाज़, शहर ए आरज़ू सब उधार में ।
मज़हब का सार एक ही है, रास्ते अलग हैं,
इसींदासागी या हकीका, पहुचे सब उधार में ।
सेहत है असली दौलत, हवा पानी आसमां से,
तंदुरुस्ती में राज है, ये फक़र सब उधार में ।
शक्ति बदन की नहीं, जज्बे की कहानी है,
इरादों की मज़बूती,देखे असर सब उधार में ।
कुछ नरमी से भी, दुनिया भरभरा रही है,
यारे अल्फाज़ से, दुनिया बदल सब उधार में ।
कोई मुझे नहीं छू सकता, मेरी रजा के बिना,
मोहब्बत जहां है, वहां जिंदगी सब उधार में ।
दोस्ताना ले-दे कर होता है,
बुनियादी ए समझौता सब उधार में ।
खुद्दारी के आगे, कोई मजबूरी नहीं चलती,
सचाई ए मर्म या धर्म बया सब उधार में ।
इंसान अपने ख्याल ए शिकार सकते में,
उनमें फर्क है जो, बेहाल सब उधार में ।
स्वरचित-सप्रेम काव्य
जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर