आराकता-मिट्यामेट,
सरे लूट-झपट्टामारी,
चोरी-सीनाज़ोरी,
जनता खौफ़जदा ए मारी।
भूख और भ्रष्टाचार से ओत-प्रोत सामंती सोच,
कमाल है जिंदा है, जहां ए अंधेर नगरी ये शोक।
पेपर नकल माफिया गली गली, गच्चे खिली खिली,
जुल्म ओ सितम हर सो, रिश्ता कुनबा यारी मिली।
बीमारियों का शहर, इलाज भी है दूर,
हुकूमत है बेहरा, आवाम का है मजदूर।
अदालतों में इंसाफ, बिकता है बाजार में,
इंसानियत है गमगीन, दर्द है इंतजार में।
इल्म ओ आदाब है बेकार,
किताबें गर करके खाक,
जहालत ए हरसमात इस्तखराज
राह ए ऊंची, खुराज बराज, तरास
ग़रीबों का है नुक्ता,
आमिरियत ए शहर,
हक़ है जुनून में,
लेकिन क़िस्मत है लहर।
जिंदगी का है रंग,
सियाही और धुआँ,
सपनों का है चेहरा,
लेकिन हकीकत बेसहरा।
कलम की तलवार है,
लेकिन जुबान है बेकार,
मजदूर की रोटी,
छीने रोज हुक्मरान।
मस्ती ए महँगाई, हसरतों की कहानी,
ख़्वाबों की बस्ती में, बस गमे अनजानी।
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शहर के शोर में एक आवाज़ है बस,
ख़ुशी से दूर, ग़म से भी ख़लास है बस।
@ जुगल किशोर शर्मा