हर टूटी हुई डाली जलकर कह रही है,
जिस तरह टूटी हूँ पेड़ के हरे-भरे पत्तों से,
एक दिन तुम भी जलोगे आग की गरमी से,
ना छांव मिलेगी ना मिलेगी चिता की लकड़ियाँ।
जब धधकती लपटें तुम्हें घेरेंगी हर ओर से,
याद आएंगे वो पल इस हरे-भरे छोर से,
तब समझोगे क्या होती है तपिश की कहानी,
ना मिलेगी राहत, ना बचेगी कोई निशानी।
नर
इसलिए संभल जा, वक्त रहते सोच ले,
पेड़ की हर डाली, हर पत्ता बचा ले,
क्योंकि जब आग लगेगी, सब कुछ राख हो जाएगा,
ना कोई छांव देगा, ना कोई साथ निभाएगा।
नर