कर्म स्य फलम् अवश्यमेव भोक्तव्यम्
अर्थात कर्म का फल हमें अवश्य ही भोगना पड़ता है परंतु दूसरी ओर भगवान गीता में कहते हैं
कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन्।
अर्थात हमारा अधिकार केवल कर्म करने में है उसके फल प्राप्ति की इच्छा में नहीं। गीता का ज्ञान हमें यह सिखाता है कि हमारे संचित कर्मों से ही हमारा प्रारब्ध बनता है अतः हमें उचित एवं शास्त्र सम्मत कर्म निरंतर करते रहना चाहिए वही हमें शुभ फल प्रदान करेंगे।
डॉक्टर श्रीमती एलके शर्मा
सेवानिवृत प्राध्यापक
प्राध्यापक