इश्क़ मे फनाह होने को महोतात होना था,
अश्क निकले बिना क्या रोना रुलाया था,
अब अधूरे सफ़र मे किनारा क्या ढूंढ के करोगे,
बिछड़ने के वक़्त पर मंजिल का पता पूछना चाहिए था,
वादे _कसमे फिजूल सी जिंदगी के इम्तिहान के दर्जे गुमनाम आशिकि के है,
नाराज़ भी हो और चुप से बैठे हो खिलाफ़ मेरे अदालत का रास्ता नाप लेना चाहिए था,
ख़्वाब खयाल् मै गुमते फिरते रहते हो हर दामन की रूह की छबि बन कर,
सपनो मे आने से पहले आयनों की करामत का हिस्सा साफ दिखाना चाहिए था,
हालत हमारी जान कर अजनबी ओ से पूछी जा रही मेरे जीने मरने की कहानी को लेकर,
वफ़ा ए महोब्बत है यार बेवफ़ाई का पन्ना कभी पलट कर हमे एक मौका लिखने का देना चाहिए था।
DEAR ZINDAGI 🙏