कई रंग झेले हैं जमाने के हमने
कभी इसने रुलाया, कभी है हंसाया,
कभी उठाया तो कभी है गिराया
कहीं बड़ों की डांट डपट
कभी गरीबी से कशमकश
कभी जरूरतों ने घेरा
कभी ख्वाईशों ने भरमाया
जिम्मेदारियों के रेले ने
सब शौक कुचले
हां बच्चों की मुस्कुराहट ने
भी था कभी गुदगुदाया
जीवन की नैया
जब भी लड़खड़ाई
पतवार इसका हमने
मुकद्दर को थमाया
तकदीर ने भी थे फिर
अजब रंग दिखाए
जब रोए तो हंसाया
गिरे तो उठाया
फूलों की तरह पाला
बस आगे बढ़ाया
जमाना और किस्मत
सभी के हैं संगी
कभी मुकद्दर पीठ मोड़े
तो जमाना उठाये और कभी
जमाने के ठुकराए को
तकदीर का सहारा
जमाना और किस्मत जिसका
एक साथ हाथ छोड़ें
उस बदनसीब का
बस हिम्मत ही सहारा
पर जो जमाने को
अपनी मुठ्ठी में हो रखता
वही होता मुकद्दर का सिकन्दर न्यारा
आर पी मल्होत्रा