मैंने सोचा आकाश कुछ कहेगा:
मैंने सोचा
आकाश कुछ कहेगा
पृथ्वी कुछ कहेगी,
इस व्यापकता में
मनुष्य कुछ गुनगुनायेगा।
आकाश कभी सिकुड़ेगा
जैसे मस्तिष्क सिकुड़ता है
धरती कभी भूलेगी
जैसे मन भूलता है।
चलो बातचीत करते हैं
सूखे की,अतिवृष्टि की
सूखती नदियों की
प्रदूषण की,पिघलते ग्लेशियरों की
जंगल की आग की
भस्म होते जीव- जन्तुओं की
गहरी होती खाईयों की।
कुछ देर ढंक लेते हैं मुँह को
प्यार के शब्दों से।
इस ठंडी सड़क पर
बात करना अच्छा लगता है,
देवी-देवता ही हैं इधर।
कितनी बातें भूल गया हूँ
जैसे नक्षत्र बुझ जाते हैं एकाएक,
बिग बैंग सिद्धांत की तरह
यहाँ विस्फोट नहीं होता,
संचरण होता है
आत्मा का परमात्मा में!
- महेश रौतेला