बहुत समय बीत चुका है
फूल तोड़ते हुये,
पेड़ काटते हुये
नक्षत्र देखते हुये।
हमारी कहानी को
भरभराकर गिरना था,
कथा-कहानी तो बहुत थीं
लेकिन हमारी कहानी में
बादलों को फटना था।
हथेलियों को देखा
स्पर्श पुराने थे,
स्वर नया रखते थे।
यादें अब ठंडी हो
बैठने नहीं देतीं,
गौरैया की तरह कभी इधर, कभी उधर उड़ा करती हैं।
** महेश रौतेला