गुमनाम हों गया आशिक़ी मे बंधा आशिक़,
परखा ना उम्र भर रहा साथ अकेलेपन का लेकर ताबीज,
जन्नत ए हासिल करने मुर्दा बना दिल जीते जी हसते हुआ रहा आमीन,
परखने वाले को तो ढूँढता रहा सफ़र गली गली मे इश्क़ की कमी के हिस्से की इम्तिहां की चाभी,
बैठा रहा वो शक्ष मंजिल मंजिल भटके को निहारता रहा, उसे दूसरे के सीने से चिपकता खामोश देखता रहा,
शिशकते हुवे अब तो कहना होगा इस दिल को नामंजूर हो फिर भी - खुदा -ए -हाफिज ।
DEAR ZINDAGI 🙏