साजन तुम तो हो जो मुझमे सारे आम बसती हो,
इन्कार ए शब्द ना मिलने की गुस्ताखी को क्यु खोजती हो,
ए लफ़्ज भी दर्द बया करते, सूखे पड़े आपकी नाराजगी को मनाने पर,
ऐसी क्या गिला ए दिल ए सनम क्या करू तुम्हें बात सही मनाने की,
राज़ नहीं ठहरा अपने दो दिल के किस्से की कहानी मे,
फिर क्यु रूठा है तू कसम दे कर ना बुलाने की आहट मे,
दर क्यु खुल्ला हैं मेरे जनाजे का कितना तड़पावोगे इस हाल को,
ऐतराज हो सब ठीक हैं बंदिश बन जाऊँ ऐसा क्या मिजाज है आपका,
तुम्हें जी आए तो बुला लेना वही खड़े रहेगे हमसफर की किनारे बनकर,
उफ़ तक ना निकालेंगे आपकी बात पर पड़छाइ भी मिले तो रो देगे नादाँ चाहत पर,
DEAR ZINDAGI 🙏