#Rose
हुश्न की निगाहों से ज़ज्बात बह रहे हैं l
अनकही दास्तान खुले आम कह रहे हैं ll
अपनों को खुश रखने के लिए बार बार l
वो मुस्कराकर गुलाबों को तह रहे हैं ll
एतबार है ख़ुदा पर इंसाफ जरूर करेगा l
ग़मगीनियाँ को छुपाने घूंघट पह रहे हैं ll
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह