नैनीताल( लघुकथा)-४
छोटी सी पगडण्डी
जहाँ से विद्यालय आता जाता था,
इतनी बार दौड़ाती थी
कि मन में छप चुकी थी,
उसका कब्रिस्तान से जाना
बहुत डराता था,
कब्रों में लेटे शव
जो अस्थियों में बदल
मिट्टी हो चुके होंगे
डरावने लगते थे।
पहाड़ याद रह जाते हैं
ऊँचाई के कारण,
चोटियों के साथ
अद्भुत दृश्यों को समेटे
दुरुहता में अटके,
भव्यता में आकंठ डूबे
हमारे झुकाव के कारण
प्रिय बने रहते हैं।
जितने पहाड़ बदले
उतने बदलाव हुये,
नींद खुली, सुख दिखे।
हमारी बातों ने
पहाड़ों को पहाड़ बना दिया
जीवन को कहा "पहाड़ सा जीवन"
फिर लौटे तो
संक्षिप्त लगा वह,
शतायु का आशीष लिए
प्यार का आयातक
प्यार का निर्यातक
खंदकों में गिरता
विभीषिकाओं से क्षतिग्रस्त
निडरता का परिचय देता
पहाड़ बन जाता है।
उसी पगडण्डी से आ
मैंने चुराया था एक पता
जो था बहुमूल्य,प्रिय
जो मुझे लगा अटूट रास्ता
प्रकृति तक पहुँचने का।
* महेश रौतेला