जब युध्द थमा तब वो अपनों से मिलें,
सहमी सांसों और कुछ बहते अश्कों के साथ मिलें,
ज़िन्दगी को हिम्मत दी तब जा कर कहीं ऐ मौका मिला,
कैद से रिहाई और आज़ादी का क्षण मिला,
आसान नहीं था ऐ सफर ड़र और खबराहट का,
हर काली रात के बाद हर गुज़रने वाली सुबह का,
ज़हन में उम्मीद की लड़ाई रोज़ाना चलती रहती थी,
रिहाई की आस मर कर फिर ज़िदा होती थी
स्वरचित
राशी शर्मा