जब से वह मेरे प्रेम में पड़ी थी―धीरे-धीरे उसकी आँखों की रौशनी जाती रही...मैं अक्सर मज़ाक में उसे अंधी कह दिया करता था!
मेरे उलाहने पर गुस्सा नहीं करती थी । वह हँसती और कहती―अंधी हूँ इसलिए तुमसे प्यार करती हूँ। बातों को ख़ूबसूरती से कहना उसे अच्छी तरह आता था।
जितना प्रेम था हमारे बीच― उतनी ही लड़ायी थी। हम ख़ूब लड़ते और ख़ूब रोते थे साथ में। गुस्से में कभी-कभी मैं उसका चश्मा तोड़ देता था। चश्में के बिना उसे कुछ भी नहीं दिखता―वह मुझे भी नहीं देख पाती थी!
मैं भागा-भागा दूसरा चश्मा ख़रीद लाता। वह चश्मा पहनती फ़िर इत्मीनान से मुझे देखती...
मुझे लगता था कि मैं ज़िंदगी को समझता हूँ। प्रेम को समझता हूँ। गलत था मैं और गलती की सज़ा भी मिली। एक दिन जब मैं उसके पास नहीं था―ईश्वर ने उसका चश्मा चुरा लिया!
अब उसे सबकुछ दिखता है―सिवाय मेरे!