न हो सामने पुस्तक,
तब भी उभर आते हैं शब्द
वे बना देते हैं एक वृत्त
मैं घूमती रहती हूँ उनमें
उस नन्हे खिलौने सी
जो अंगूठे और तर्जनी
के सहारे घुमाया जाता है
बहुत देर तक घूमता रहता है वह,
मैं अपलक
देखती हूँ उसमें अपना
प्रतिबिंब!!
शुभ रात्रि मित्रो
डॉ. प्रणव भारती