पहाड़ी नदी है
जो बह रही है,
समय की अपारता को
अपने में समेट रही है।
उसे छू कर मन
हल्का हुआ,
उसके आर पार जा
आनन्द मुस्कराया।
उसके वक्ष पर
अनेक पत्थर हैं विशाल,
वह धोती आयी इन्हें
और देते आयी है मीठा जल।
मन नदी के साथ बह
व्यापक हो गया,
ठंड धीरे से निकल
मिलने आ गयी।
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** महेश रौतेला