मानो बिन मिले भी जैसे मिल रही हूँ मैं..!
ऐसे किसी शहर की हवा में घुल रही हूँ मैं..!
जानती हुं हर शब्द गलत, हर वचन है खोखला!
क्यूँ अब भी खोखली बातों से पिघल रही हूँ मैं..!!!
हालाँकि दूर-दूर तक कोई संकेत नहीं थे उनके,
'वो आएगा-वो आएगा'! क्यों ये सोच कर मचल रही हैं मैं!
शिकवे-शिकायतें कर ख़त्म, मत कर मन इतने सितम,
बुज़ी हुई स्वयं हरदम, फिर भी जल रही हूँ मैं!
बरचट नगर, न चाहत की डगर! कौन सा है ये गुरुत्वाकर्षण ?
जिसकी व्यर्थ तृष्णा की आग में 'मीरां' उबल रही हूँ मैं!
જાગૃતિ, 'ઝંખના મીરાં'..