मेरे शहर में आग है
धू-धू जलते विचार हैं,
पत्थरवाजों की विसात है
तलवारों की नग्न धार है।
जिधर देखो खून है
मरते मनुष्य की आह है,
श्रीकृष्ण कहें गांधारी से
माँ, दोनों ओर मेरा खून है।
पूछो, इतने धर्म क्यों
धर्म पर इतने अधर्म क्यों,
धू-धू कर आग लगे
ऐसा मनुज का कर्म क्यों?
* महेश रौतेला