खो जाती हूँ बीते लम्हों की उन यादों में जब ,
यूँ हाँथ थाम मेरा बाहर लाते हो तुम,,
वो अनकही कहानी का हिस्सा ना होके भी,
यूँ सीने से लगाकर सुन जो पाते हो तुम,,,,
मजबूर होने से मगरूर होने तक के सफ़र में ,
यूँ जज़्बातों के समंदर में समा जाते हो तुम,,
वो ख़्वाब देखने से भी डरते थे जो ,
उनके ख़्वाबों को हक़ीक़त बना जाते हो तुम ,,,
तमन्ना का नाम दो या कोई आरज़ू ही कह लो,
साथ खड़े होकर, मान मेरे नाम का बढ़ा जाते हो तुम,,