सपनों की दस्तकें
दस्तके देते हैं,
बार - बार पूछते हैं,
क्या ऐसे ही हार मान लोगे?
हम इन ख्यालों से झूझते हैं।
क्यों नहीं चल पाते
जिन रास्तों पर चलना होता हैं।
क्यों बार - बार भटक जाते हैं,
वहीं, जहाँ नहीं जाना होता हैं।
मौका हैं, आगे बढ़ने का,
सपने पूरे कर, कुछ बनने का।
कर दिखा रख्वाबों को साकार,
मत झूझ इन ख्यालों से
तू बार-बार
एक उम्मीद हैं,
एक कोशिश हैं,
खुदा से कुछ बन जाने की
सिफरिश हैं।
डर मत, बढ़ता रह,
खुलेंगे दरवाजे एक दिन,
दस्तकें आ मिलेंगी एक दिना
डर मत, बूढ़ता रह,
क्योंकि दस्तकें ज़रूर
मिलेंगी एक दिन ।।
लेखक - मनस्वी पूरी