प्रेम समर्पण में ही निहित है,
सम्पूर्णतया मन समर्पण में, हृदय समर्पण मेँ
राधा, मीरा, रुक्मणी, तीनों ने चाहा कान्हा को,
और अपने अपने तौर पर सम्पूर्ण मन से चाहा,
मीरा ने अपने भजन में ही कृष्ण को रचा-बसा लिया,
अपनी भक्ति में ही उन्हे निहारा, उन्हे प्रेम किया,
पर कहीं न कहीं उन्हे मन ही मन में कृष्ण को पाने की कामना भी थी,
रुक्मणी कृष्ण को पूर्णतया पा कर उनकी भार्या कहलाई,
उनके साथ जीवन के सभी कटु और मधुर क्षणों को जिया उनकी सहचरी बनकर, मित्र बनकर,
परन्तु उन्हे भी थोडा़ बहुत अभिमान तो था कृष्ण की जीवन संगिनी होने का,
राधा ने कभी मोहन को पाने की लालसा में उनसे प्रेम नही किया, उन्हे बस प्रेम था अपने कृष्ण से, अथाह, अनन्त, अलौकिक, अकल्पनीय, अकथनीय
इसलिए कृष्ण सदेह कहीं होकर भी हृदय से हरपल राधा के साथ ही रहे
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से...