मुद्दतो बाद मुलाकात हुई।
मुद्दतो बाद कोई याद आया।
आप तो आ गए है अन्दर तक।
बाहर कौन है, जिसने किवाड़ खटकाया।
बिछड़कर फिर से मिलने का इरादा है।
हमे लगता है ये इश्क़ ज़रा आधा है।
ये कच्चा इश्क किस रंग से बनाया था।
ओढ़ कर मख मल ए इश्क़ बेपनाह हुए।
रंग उतरा तो खुदा इश्क़ समझ आया था।
अब तो बाकी है उम्र खाली।
इश्क़ तो मर गया कहानी में।
न हम रहे न रही मोहब्बत ज़ालिम।
आग ऐसी लगी जवानी में।
हश्र कुछ ऐसा हुआ जमाने में।
वो यूं बिखर गया निभाने में।
हुस्न को रास न आई उसकी नवाजिश अब भी।
वो उसे याद करता था कब्र खाने में।
मैं उसे रोज़ लिखता था अपने हाथों से पैग़ाम।
वो मुझे रोज़ मुकद्दर का दिलाशा देती।
मैं तो कागज़ को हम समझ बैठा।
वो उसे रोज़ तमाशा कहती।
आज है इश्क़ सराबोर उन अहातो में।
हम भी क्या खूब नहाए थे उसकी बातों में।
इश्क़ बेहद जरूरी है आदमी के लिए।
फकत ये जंग न हो आशिकी के लिए।
ख़त जलाओ मरोड़ो फाड़ डालो।
मगर ये समंदर में ज़रा धीरे से उतरना इश्क़ वालो।
आनंद त्रिपाठी
लेखक।
आपके दिल तक। 😊