ये मतलबी दुनिया ,कोई व्यपार सी लगती है,
और जिंदगी कोई , बजार लगती है।
मतलबी रिस्तोका,रेला सा लगता,
अनसुने खयालात का , मेला सा लगता।
हर कोई पैसो की, उँची बोली बोलता,
रिस्तो के नाम पर,खोट-फायदा सोचता।
कागज की कस्तीमे,हर कोई सवार,
पैैसो के वास्ते,धोका देने सब है तैयार।
झुठी वाह वाहीको मान सच,रखते धमंड,
जैसे पथ्थरके हाथोमे,काच का सामान।