अधीर रति
सोच रहा हूँ क्या मैं लिखूँ ,
प्यार भरी अल्फाज़ को
हुए ना पूरे रहे अधूरे,
चोट लगी ज़ज्बात को
चाहा डूबना इस सागर में ,
रह गया किनारों पर
कह नहीं सकता किसी से,
पर लिख रहा इस बात को
बैठे राह देखता रहा,
मैं तो जिनके आस में
हमें क्या पता था कि,
वो हैँ किसी और के खास में
विशाल धुसिया