रिवाज़-ए-कर्म
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इस ज़िंदगी का यही सबसे बड़ा बंया हो गया,
झूठा ही था, पर फैसला तेरे नाम हो गया.
हम ढूंढते ही रहे मकाम सारी उम्र रास्तों पर,
नज़दीक आये तो वह भी तेरे नाम हो गया.
शायद यही जमाने का रिवाज़-ए-कर्म है,
जो मेरा था वह किसी और का हो गया.
- Sharovan.