Hindi Quote in Poem by DrPranava Bharti

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मेरा तो स्पर्श  मात्र है !

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नहीं जानती ,नहीं समझती फिर भी सब कुछ चलता रहता 

मन की चाहरदीवारी  भीतर मानो कुछ गुनता  सा रहता 

चंदन -वन भीतर उगते हैं ,लिपटे रहते सर्प मुझी से 

स्वयं  दिशाओं में घुलती हूँ ,जाने क्या-क्या मैं सुनती हूँ 

मन के चौराहे  पर जाकर रब की मैं बाणी गुनती हूँ 

सब कुछ चलता रहता  भीतर मैं तो कुछ भी न करती हूँ 

मेरा तो स्पर्श मात्र है ------

 मन के आसमान में कैसे झंझावातों के पहरे हैं 

पलकों के पर्दों  में जाने कितने-कितने गुम  चेहरे हैं 

कभी बनी हूँ  रानी  मैं तो,दासी कभी बनाता कोई 

 खिले फूल से  चेहरे पर बरबस आँसू दे जाता  कोई  



पग-पग में चुभते काँटों को पल-पल मैं चुनती रहती हूँ 

मौन खड़ी अदृश्य दिशा में यादों की चादर बुनती हूँ 

मेरा तो प्रारब्ध मात्र है------

जाने कितने उजले चेहरे धवल वस्त्र में सजकर आते

 मन के वस्त्रों की वो मेरे चिंदी कर,  कहकहे लगाते

राम कभी रावण बन करके पीड़ा दी है सदा निरंतर 

तन-मन दोनों ही भटके हैं,ठोकर खाईं क्यों हैं दर दर 

प्रश्न सदा कौंधे हैं मन में उत्तर नहीं अभी पाया है 

उथल-पुथल करते जीवन में  पूरा जीवन भरमाया है 

मेरा तो आक्षेप  मात्र है--------

जर्जर जीवन के खंडहर हैं,जाने कितने आडंबर हैं

मेरे सम्मुख ताजमहल हैं या फिर टूटे-फूटे घर हैं 

नहीं मध्य का मार्ग मिले तो जीवन कटुता से भर जाता 

जाने  क्या पाता  है जीवन, न जाने क्या खोता जाता 

सभी चैन से जी पाएं तो मन उत्फुल तब हो सकता है 

अन्न-वस्त्र जब मिलें सभी को जीवन -पुष्प खिला सकता है 

 मेरा तो साक्षेप मात्र है --------॥ 

                 डॉ प्रणव भारती

Hindi Poem by DrPranava Bharti : 111855240
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