मेरा तो स्पर्श मात्र है !
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नहीं जानती ,नहीं समझती फिर भी सब कुछ चलता रहता
मन की चाहरदीवारी भीतर मानो कुछ गुनता सा रहता
चंदन -वन भीतर उगते हैं ,लिपटे रहते सर्प मुझी से
स्वयं दिशाओं में घुलती हूँ ,जाने क्या-क्या मैं सुनती हूँ
मन के चौराहे पर जाकर रब की मैं बाणी गुनती हूँ
सब कुछ चलता रहता भीतर मैं तो कुछ भी न करती हूँ
मेरा तो स्पर्श मात्र है ------
मन के आसमान में कैसे झंझावातों के पहरे हैं
पलकों के पर्दों में जाने कितने-कितने गुम चेहरे हैं
कभी बनी हूँ रानी मैं तो,दासी कभी बनाता कोई
खिले फूल से चेहरे पर बरबस आँसू दे जाता कोई
पग-पग में चुभते काँटों को पल-पल मैं चुनती रहती हूँ
मौन खड़ी अदृश्य दिशा में यादों की चादर बुनती हूँ
मेरा तो प्रारब्ध मात्र है------
जाने कितने उजले चेहरे धवल वस्त्र में सजकर आते
मन के वस्त्रों की वो मेरे चिंदी कर, कहकहे लगाते
राम कभी रावण बन करके पीड़ा दी है सदा निरंतर
तन-मन दोनों ही भटके हैं,ठोकर खाईं क्यों हैं दर दर
प्रश्न सदा कौंधे हैं मन में उत्तर नहीं अभी पाया है
उथल-पुथल करते जीवन में पूरा जीवन भरमाया है
मेरा तो आक्षेप मात्र है--------
जर्जर जीवन के खंडहर हैं,जाने कितने आडंबर हैं
मेरे सम्मुख ताजमहल हैं या फिर टूटे-फूटे घर हैं
नहीं मध्य का मार्ग मिले तो जीवन कटुता से भर जाता
जाने क्या पाता है जीवन, न जाने क्या खोता जाता
सभी चैन से जी पाएं तो मन उत्फुल तब हो सकता है
अन्न-वस्त्र जब मिलें सभी को जीवन -पुष्प खिला सकता है
मेरा तो साक्षेप मात्र है --------॥
डॉ प्रणव भारती