Hindi Quote in Poem by DrPranava Bharti

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अनुत्तरित

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पिघल रहा है

कुछ तो

जैसे पिघलती है मोम

जमती रहती है वहीं

नहीं छोड़ती अपना स्थान

जमती जाती है

फिर पा गर्माहट

पिघलती है

पसरती है

शनैः शनैः

रह जाती है

चिन्ह भर.....

सुनते हैं

पिघलने लगे हैं

हिमखंड भी

धड़कने लगे हैं दिल भी

ऊपर और ऊपर

जाने का ख़तरा

जमा देता है नसों में

एक बेचैन अहसास

पिरोता रहता है

प्रश्नों को,बींधता है

मोटे सूँए से

माला बना. सर्पदंश सा

काटता है मनोमस्तिष्क के

गलियारों को

अविछिन्न..

एक और हिमखंड

जमाता रहता है रक्त

इसकी यात्रा है

ऊपर से नीचे की ओर

मस्तिष्क से होता हुआ

ग़ुज़रता है ,आँखों में सिमटता है

दिल में जमता है

चला आता है पैरों तक

जमाने लगता है

देह पूरी.....

आख़िर कैसा

हिमखंड है यह

टूटता ही नहीं

जमता रहता है

ताउम्र......

आँसुओं की गर्माहट से भी

हिलता नहीं

चिंदी भर भी

जमता ही तो जाता है

कंकड़, पत्थर

पहाड़ बन

पशोपेश में हूँ......!!



डॉ प्रणव भारती

Hindi Poem by DrPranava Bharti : 111851604
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