सच, लम्हों के
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उन सवालों के जवाब
मिलते नहीं
जिनकी तलाश में
गुज़ार दी उम्र सारी
बहुत संभालने का
किया प्रयास जो
सदा रहा विफल ही
नटखट वायु की भाँति
झूलते प्रश्न लटकते रहे
बुनते रहे जाले....
आसमान के बदलते
रंगों को रख जेब में
निकल पड़ी मैं
जिधर दोरंगी उधार
ज़िंदगी के टँगे रह
गए थे चीथड़े !
कतरा कतरा बीनते
उन सवालों ने
कर डाली खेती
और नए सवालों की....
अब था मेरे इर्द-गिर्द
एक नया जंगल
जो चिढ़ा रहा था मुझे
मेरे और उसके बीच
फैलता जा रहा था....
बाज़ारवाद का सिलसिला
था ज़ोरों पर....
हो आवाक, उम्र की ढलान पर
लिखा मैंने
ढाई आखर प्रेम का
और लगा, बेफ़िक्र हो गई हूँ
मैं प्रेम में खो गई हूँ....
लेकिन एक
पर्दा विहीन सवेरा
सौ सौ प्रश्नों के साथ उतर आया
मेरी आँखों में
और मैं
करने लगी प्रतीक्षा
एक और नए
झंझावात की....
मेरी आँखों में,साँसों में
दिल में, जिगर में
आहों में,विचारों में
ठहाकों में
कराहों का बाज़ार
गर्म था
एक चुटकी प्रेम
संभालने में
पिघल गया था
वज़ूद मेरा
मोम सा----
जो, छोड़ जाता है
निशान भर....
डॉ.प्रणव भारती