मैं समय को यहाँ ढकता गया
सुन्दर वादियों में झुलाता रहा
कहा -अनकहा सुनाता रहा
हँसना-रोना सब मिलाता गया,
जो पग मैंने रखा था अकेले
उसे तुम तक पहुँचाना चाहा
जो हाथ अपना बढ़ाया धीरे
उसे भी मन से जोड़ना चाहा,
संसार सारा छोटा ही लगा
किसी ओट में , मैं बैठा रहा
गुजरते हुए क्षण मुड़ते नहीं थे
यादों का कुआं भरता नहीं था।
दुआएं कभी कम हुई नहीं
उजालों को देखो तो दिखते गये
विवशताएं सब फलती -फूलती रहीं
पर चलने की डगर कभी खोयी नहीं।
**महेश रौतेला
०३.१२.२०१५