जब प्रेम किसी व्यक्ति से हो
तो शिकायत , पीड़ा , नाराजगी स्थाई रहती है मगर !
जब प्रेम परमात्मा से हो तो शिकायत , नाराजगी , पीड़ा
उनकी इच्छा हो जाती है | मगर एक दिन वह इन सबसे
बाहर निकाल जरूर देता है | तभी यात्रा प्रारम्भ होती है ,
स्वंय से उस तक | स्वंय मे स्वंय तक |