विंशतिश्चोपदेशे स्युःश्लोकाश्च पञ्चविंशतिः।
सत्यात्मानुभवोल्ला से उपदेशे चतुर्दश॥
“Give your wealth only to the worthy and never to others. The water of the sea received by the clouds is always sweet.”
धर्म-धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम् । धर्मण लभते सर्वं धर्मप्रसारमिदं जगत् ॥
भावार्थ :
धर्म से ही धन, सुख तथा सब कुछ प्राप्त होता है । इस संसार में धर्म ही सार वस्तु है ।