क्यों याद हैं ?
भूलता क्यों नही हृदय ?
तुम्हारी याद के साथ अशान्ति
का निवास है |
कभी शान्त हुई तो फिर
खोजने लगी,
अशान्ति ,
जैसे की तुम्हे पाने का जरिया हो |
तुम्हे खोने का भय दिनोदिन
गहराता रहा |
सामने उसी भय की सत्य सी
तश्वीर सी बन गयी |
अपने अन्दर केवल खामियाँ ही
महसूस की तुम्हारे
हर शब्द में खुद को टटोला |
ली खुद पर बद्दुआ तुम्हे
आशीष से नवाजती रही |
भीतर बस एक ही बात बैठी,
मै ही योग्य नही ! मुझमे योग्यता नही !
मै विश्वास के
काबिल नही |
जिसका आधार तुम्हारे शब्द थे |
हाँ !
तुम्हारे शब्दों पर ,
तुम पर कभी अपना
अधिकार छोड़ जो
न पाई | क्यों तुमपर यह
अधिकार की भावना रही ,
शायद इसका कारण विश्वास की हरी जमीन रही |
ढह गये सारे आधार मगर यह कभी सूखी नही |
आज एक प्रश्न अन्त:उमड़ रहा है ,
बार -बार खुद को अविश्वासी, अयोग्य ठहराया ही ठहराया ? किसी के
शब्दों पर अपना जीवन बिताया ?
खुद को छोड़कर विश्वास किसी
अन्य पर आया |
यह भेद तो तूने ही उपजाया |
तू अगर काबिल नही ?
काबिल उसे कहाँ से पाया ?
किया विश्वास जिसपर ,
उसने कितना निभाया ? ....