ज्यादा नही बदल पाई खुद को
बस इतना कि , अब आरोपो को
सच मानकर खुद मे ,
उसकी तलाश करती हूँ ,
नही करती विरोध किसी का लगता है सब
सच है |
सारी विपरीत बाते जिसका केन्द्र मै हूँ |
ज्यादा कुछ नही बदल पाई हूँ , हूँ ! आज भी
उसी स्वभाव कर्म मे मगर जो भी गुजर रही
है उसे अपने ही कर्मो का परिणाम मान स्वीकार
कर रही हूँ | अन्तर मे छिपी पीड़ा अब पीड़ा जैसी
नही लगती यह अब स्वभाव बन चुकी
है भावना का |
नही रहा इस पीड़ा का भागीदार कोई ,
शामिल करना भी
चाहा किसी को कभी ,
उकताकर दूर खड़ा हुआ |
है भी कहाँ आसान भावना को
सम्भाल पाना | ......