रुठने की वजह तलाश रही
कमियाँ खुद मे,
कोसती रही खुद को ,
हर एक बात के लिए |
मुझमे भी तो बेकसूरियत थी ?
दी सजा खुद को |
कसूरवार !
खुद की भी तो रही ?
खूब मिला सिला !
भावना आहत हुई
अनगित बार !
भर गया जी ! ,
नही रहा अब गिला ,
जो मेरा होता तो जुदा होता?
दूरियों मे आज खुदा होता ?
जो है मेरा तो कहाँ जायेगा ?
जीते जी न सही मरकर तो हाथ आयेगा ,
प्राणों की किसें फिकर ही है ,साँसों पर ही
नही मेरा घर है |ओ
जागी थी मै ! कभी तुमने जगाया था ,
देह को भी मन्दिर बनाया था |
है आज भी है मूर्ति तुम्हारी मगर !
मूर्ति से अधिक प्यारे हो तुम !
बँध गई थी मूँर्ति के मोह में ,
अच्छा है !
खुद ही तोड़ दी तुमने ,
मगर मुझे कैसे तोड़ पाओगे,
टूटी तो भी हर हिस्से में खुद को ही पाओगे |