#मेरीकविता
बदलाव की पहली सीढ़ी
कोई आहट नही करती |
रखूँगी जल्द ही जाने क्यों
लगता है ऐसे ही , मगर ..!
नही जानती क्या बदलेगा ?
कैसे बदलूगी ? मगर ..!
इतना जानती हूँ शायद
ऐसी नही रहूँगी | ख्वाहिशों
की आलमारी में इच्छायें
अस्त -व्यस्त पड़ी है !
उस कमरे में जाने का
अब मन होता नही |
पड़ती रही उनमे परत -दर परत धूल
जिनमे चेहरा नजर आता नही |
नही दिखती तो चलो अच्छा ही है |
फिर सोचती हूँ वह मृत तो नही |
बिना जिये ही मृत्यु की कगार पर
नियती की परम्परा निभा रही हों जैसे |