न जुनून न तलाश रही कभी ,
मुझमे रही बस यही कमी |
न जिद पकड़ी ,जिद्दी नही हूँ !
कभी सोचा ही नही आखिर
किसे पाया जाये , क्या स्थिर है ,
किस पर जुनून लाया जाय |
रही भौतिक ,अभौतिक आभावों
से घिरी मगर !
हर एक चीज मिटनी है जाने,
क्यों अन्तर से मिटा न पाई |
बहुत रंग बदले जीवन ने,
भावनाएँ परिवर्तित हुई |
मगर कुछ है फिर भी ! जो कभी
बदला नही | सोचती हूँ !
बदल सबकुछ गया मगर !
मै आज भी हूँ वही |
बेशक अन्त: पीड़ा रह - रहकर
दबाती है गला मेरा प्राण आकर गले तक,
लौट जाता है वापस |
रोकती है छविस्मृति ,
जो पीड़ा का कारण रही,
आखिर क्यों तुममे ऐसी प्रीत मेरी |
भूलना और याद करना दोनो ही
बस में नही | तीसरा ! समय जाने,
नही लिया कभी निर्णय कोई |
हाँ ! है प्रश्न जो तुमने जगाये ,
होती है आवृत्ति ,
यही आवृत्ति ही मान लो तुम विश्वास
या दृढ़ता मेरी |
जो कुछ है क्रम बस स्वतः ही |
बस समझ गई इतना जो तुमसे है,
वह किसी और से नही |