सुख में दुख में दीप जलेगा
सुन्दर अपना विश्व रहेगा,
जब तक प्रकाशमय पूजा होगी
अंधकार सब सूखा होगा।
दीप जले कुछ मेरे अन्दर
दीप जले कुछ तेरे अन्दर,
रामराज्य की कथा मिलेगी
दीपों की बारात यहाँ सजेगी।
नभ पर नक्षत्र उतर रहे हैं
धरा पर दीपक निखर रहे हैं,
आओ, दीपों से रिश्ता जोड़ें
पूर्ण प्रकाश त्रेता का मोड़ें।
मन में उत्सव बना रहे
शिशु हम में जगा रहे,
पूरब -पश्चिम, उत्तर- दक्षिण
कण- कण यहाँ मिला रहे।
दीपक हममें नया रहे
हर क्षण, हर पल जला करे,
जड़-चेतन का सूक्ष्म स्पर्श
नयी मुस्कान देता रहे।
छोटे सा क्षण मेरे अन्दर
दीप जलाने आया है,
दूर गगन को इस धरा से
आज मिलाने लाया है।
* महेश रौतेला