तरह- तरह की आवाज़ों का मेला लगा है
शब्दों की भारी भीड़ जुटी है
शब्द!
तरह- तरह के करतब दिखाते हुए थक चुके हैं
कुछ अपने होश खो बैठे हैं
कुछ के अर्थ की लाठी
अब उनका साथ नहीं दे रही
कुछ के मर्म की चेतना लुप्तप्राय है
तो कुछ के भावों का प्राण प्रवाह
अभिरुद्ध हो चुका है
इन्हें अब थोड़ा विश्राम चाहिए.....
#प्रज्ञाशर्मा