नही जानती जीवन क्या है ,
न जीना आया ? खुद एक प्रश्न चिन्ह
हूँ | आखिर क्या हूँ ? क्यों हूँ ?मै खुद से
संतुष्ट नही हूँ | भोजन के आधीन नही हूँ,
मगर त्यागना न आया | जीने की ललक
जलती बुझती रही मगर ,नीरसता मे भी
जीना ही भाया | जी क्यों रही हूँ उत्तर मे मुफलिसी है
मगर फिर भी मरना न आया | हँसती हूँ !
मुसकुराती हूँ ! जाने कितने वेष बनाती हूँ ,
गम से बोझिल भी नही हूँ,
मगर ! नही वाकिफ
खुशी से खुश रहना न आया|