Hindi Quote in Quotes by Dr Jaya Shankar Shukla

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अगर हम ठीक से मन की प्रक्रिया को समझ लें, तो मन की प्रक्रिया को समझकर जीवन बदल जाता है। प्रक्रिया ये है कि मन हमेशा चीजों को दो में तोड़ देता है, मान-अपमान, सुख-दुःख, शांति-अशांति, संसार-मोक्ष। और कहता है एक नही चाहिए, अरुचिकर है,और एक चाहिए रुचिकर है-बस ये मन का खेल है| "
इसमें हम क्या करें? हम बस इस द्वंद्व को स्वीकार लें, इसका विरोध न करें, इससे बचें नहीं|अगर हम अस्वीकार करते हैं तो हमारा अहंकारी रुप बना रहेगा, स्वीकार करते हैं तो अहंकार विलीन हो जायेगा|इसके साथ सहजावस्था,सिद्धावस्था आती है अस्तित्व में|स्वीकार से हम पार हो गये|
आदमी तो अस्वीकार करते हुए भी उससे बचता है|
कोई कहता है-"मुझे पसंद नहीं है|"
तो ठीक है, क्या हर्ज है स्वीकार ले कि मुझे पसंद नहीं है|
लेकिन आदमी पसंद न होने को भी पसंद नहीं करता जिसका अर्थ है द्वेष से द्वेष|
यहाँ हमारी समझ काम आती है|चित्त में है द्वेष , तो है|हम द्वेष से द्वेष क्यों करते हैं? यहीं तो हमारा कर्ता भोक्ता रुप बनता है|
पसंद है, पसंद नहीं है ऐसा कहते ही हम कर्ता भोक्ता बन जाते हैं|
लेकिन जब हम समझ लेते हैं कि ये पसंद, नापसंद से हमारा कोई प्रयोजन नहीं, ये तो अंत:करण की वृत्तियाँ हैं कि इनसे बचने से काम नहीं चलता, इन्हें स्वीकार लेना उचित है तब स्वीकारने से हम इनसे छूट जाते हैं|
हमारा किया कुछ नहीं, सिर्फ नकारने के कारण हम इससे बंधे हैं|द्वंद्व का स्वीकार हमें अपने आप हमारी सहजावस्था में ले आता है|
यह ध्यान रहे कि हमारे भीतर जो होना चाहिए, नहीं होना चाहिए, जो इच्छा अनिच्छा जगती है वह हमारा स्वरूप नहीं है|वह सब गुणों का गुणों में बर्तना है यह जानकर हम अपने द्रष्टा भाव में आ सकते हैं|
अभी हमारे लिए इतना काफी है कि हम इस द्वंद्व को नकारें नहीं, इससे बचें नहीं अपितु इसे स्वीकार लें|
अस्वीकार न करें, अस्वीकार होता है तो अस्वीकार को भी स्वीकार लें|नापसंदगी, नापसंद है तो उसे भी स्वीकार लें|नापसंद होने को नापसंद नहीं करें|
पसंद मालूम पड रहा है काफी है|हमारा खुद का पसंद करना हमारा राग के वश होना है, अहंकारी होना है|
नापसंद हो रहा है पर्याप्त है|लेकिन हमारा खुद का नापसंद करना, हमारा द्वेष के वश में होना है|
संभावना हमसे है|हम ही रागद्वेष के वश में हो गये तो समझ के द्वार बंद हो जाते हैं|
पसंद है, पसंद नहीं है-क्या इसे केवल जाना नहीं जा सकता स्वीकार भाव से?
ध्यान दें यहाँ क्या पसंद है, क्या पसंद नहीं है इसकी बात नहीं हो रही है , बात हमारी हो रही है कि हम सहजता से अपने भीतर मौजूद रागद्वेष को, पसंदगी, नापसंदगी को स्वीकार पाते हैं या नहीं? स्वीकार हमें इनके द्वंद्व से छुडा देगा|अस्वीकार बांध देगा हमें हमारे अहंकारी रुप से|

Hindi Quotes by Dr Jaya Shankar Shukla : 111836775
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