जो दिखता है सामने
हाँ ! जाने क्यों तकलीफ होती है |
कभी कम ,
कभी ज्यादा ,
कभी बिल्कुल
भी नही |
जब कम होती है तो,
तलाशती हूँ खुद मे वजहे,
कमियाँ | फिर झाँकती है
शिकायत अपने भीतर आईने
मे खुद को देखती हुई |
जब अधिक होती है ,
तो हृदय से दुआओं का सागर ,
खुद को तुमसे से पृथक करती ,
अस्तित्वहीनता का भाव लिए |
हाँ ! तुम्हारे बिना आखिर !
मेरा अस्तित्व जो नही |
जब बिल्कुल नही होती ,
तो लगता है कोई नाटक
चल रहा है | सत्य से प्रतीत होते |
सब भेदरहित है , मगर मै भेद नही
जानती | मै बुद्धि को भी नही जानती ,
मै भावना को भी नही जानती |
मै कुछ नही जानती |
बस मै महसूसियत को शब्दों मे
ढाल देती हूँ | इससे अधिक स्वीकार्यता
मुझमे नही |