तू चाह कर भी
खुद को गिरा नही सकता |
लिखा है तेरा वह नाम
तू मिटा नही सकता |
दर्द और दूरियों से क्या
फर्क पड़ता है ,
अभी तक तो
लगा यही ,
ये दूरियाँ तेरा बढ़ना है |
क्या पता शायद !
मुझमे रह कर मै ही खत्म हो जाऊँ,
चिता की राख तक सिमट
जाऊँ , देखना है इन्ही आँखों से
खुद को जीवित होते |
क्या पता देखूँ या न देख पाऊँ |
कर्म की कसौटी पर खरी जो नही
हूँ बार बार खड़ी ही तेरा
नाम गोहराऊँ |....