शंकरभाष्य में माया का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है -अविद्यात्मिका हि बीजशक्तिः अव्यक्तशब्दनिर्देश्या परमेश्वराश्रया मायामयी महासुप्तिः, यस्यां स्वरूपप्रतिबोधरहिताः शेरते संसारिणो जीवा । आचार्य शंकर के दर्शन में माया और अविद्या का प्रयोग एक ही अर्थ में हुआ है। जिस प्रकार आत्मा और ब्रह्म में तादात्म्य है, उसी प्रकार माया और अविद्या अभिन्न है। शंकर ने माया, अविद्या, अभ्यास, अध्यारोप, भ्रान्ति, विवर्त, भ्रम, नामरूप, अव्यक्त, मूलप्रकृति आदि शब्दों का एक ही अर्थ में प्रयोग किया है। परन्तु बाद के वेदान्तियों ने माया और अविद्या में भेद किया है। उनका कहना है कि माया भावात्मक है, जबकि अविद्या निषेधात्मक है।