बाल-बाल बचाते हो ,
तुम्हे मेरे प्राणो से मोह ! इतना ,
खरोच भी न लगने देते हो |
मुझ एक को जाम से निकालने के लिए
न जाने कितनी भीड़ जमा देते हो ,
रहते हो अगल-बगल साये कि तरह ,
मगर नजर से मेरी खुद को छुपा लेते हो |
बाहर से अधिक अंदर के जाम से बोझिल हूँ मैं!,
हाथ पखड़ खींच क्यों न मुझे निकालते हो |
वार्तालाप